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राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनावों पर ‘संवैधानिक संकट’: हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई से किया इनकार, अब नई बेंच के पाले में गेंद; सरकार ने मांगी 90 दिन की मोहलत

जयपुर। राजस्थान में स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) की रीढ़ माने जाने वाले पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों को लेकर चल रहा कानूनी गतिरोध अब एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। तय समय सीमा में चुनाव नहीं कराने पर राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के खिलाफ दायर अवमानना याचिका (Contempt Petition) पर मंगलवार को हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई अचानक टल गई। यह स्थगन किसी तकनीकी खामी की वजह से नहीं, बल्कि जजों द्वारा स्वयं को इस केस से अलग करने (Recusal/Exception) के कारण हुआ है, जिसने इस पूरे मामले में कानूनी और प्रशासनिक सस्पेंस को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।

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राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनावों पर 'संवैधानिक संकट': हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई से किया इनकार, अब नई बेंच के पाले में गेंद; सरकार ने मांगी 90 दिन की मोहलत 2

हाईकोर्ट में जजों का ‘एक्सेप्शन’: अब 16 जुलाई को नई बेंच करेगी फैसला

मंगलवार को जब जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ के समक्ष अवमानना याचिका सुनवाई के लिए आई, तो खंडपीठ ने इस मामले को सुनने से इनकार (Exception) कर दिया। जजों के इस कदम के बाद:

  • नई बेंच का गठन: अब इस संवेदनशील मामले में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) के निर्देश पर एक नई विशेष बेंच का गठन किया जाएगा।
  • अगली सुनवाई: नवगठित बेंच आगामी 16 जुलाई 2026 को इस मामले पर नए सिरे से सुनवाई करेगी।
स्थानीय निकाय चुनाव डेडलाइन ट्रैकर (2026)पूर्व निर्धारित समय सीमावर्तमान प्रशासनिक स्थिति
वार्ड परिसीमन व मतदाता सूची संशोधन20 जून 2026प्रक्रिया अभी तक अधूरी और ठप
संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराना31 जुलाई 2026सरकार ने चुनाव टालने का प्रार्थना पत्र दिया
प्रशासन द्वारा मांगा गया अतिरिक्त समयलागू नहींओबीसी रिपोर्ट के बाद 90 दिन का समय मांगा

संयम लोढ़ा की याचिका: “अधिकारी जानबूझकर कर रहे कोर्ट के आदेश की अवहेलना”

यह अवमानना याचिका पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने सीधे तौर पर राज्य के चार बड़े शीर्ष अधिकारियों को पक्षकार बनाते हुए उन्हें दंडित करने की मांग की है:

  1. राजेश्वर सिंह (राज्य चुनाव आयुक्त)
  2. राजेश वर्मा (सचिव, राज्य निर्वाचन आयोग)
  3. डॉ. जोगाराम (पंचायतीराज आयुक्त)
  4. प्रतीक चंद्रशेखर जुईकर (निदेशक, स्वायत्त शासन विभाग – DLB)

याचिकाकर्ताओं का गंभीर आरोप: “हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश में साफ-साफ और शब्दों में कहा था कि चुनाव कराने के लिए राजस्थान पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC Commission) की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया जाए। इसके बावजूद अधिकारी उदासीनता और गैर-जिम्मेदार रवैया अपनाते हुए आपस में केवल पत्राचार का खेल खेल रहे हैं। हमने 1 जुलाई को इन अफसरों को विधिक नोटिस भी दिया था, लेकिन इनका रवैया पूरी तरह टालमटोल वाला रहा है।”

सरकार का काउंटर-अटैक: “50% आबादी को बिना आरक्षण दिए चुनाव कराना अन्याय”

अवमानना की गाज गिरने से ठीक पहले राज्य सरकार ने कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र (Application) दायर कर अपना बचाव किया है। सरकार की दलीलें पूरी तरह से राजनीतिक और सामाजिक संतुलन पर टिकी हैं:

  • OBC आरक्षण का पेच: सरकार का कहना है कि प्रदेश में ओबीसी (OBC) की जनसंख्या लगभग 50 प्रतिशत है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के ‘ट्रिपल टेस्ट’ नियमों के तहत उनके राजनीतिक आरक्षण का निर्धारण किए बिना चुनाव कराना इस आधी आबादी के साथ सामाजिक अन्याय होगा।
  • 90 दिनों का गणित: निर्वाचन आयोग ने पंचायतीराज विभाग को लिखे पत्र का हवाला देते हुए कहा है कि यदि सरकार 31 अगस्त तक आरक्षण का अंतिम विवरण आयोग को सौंप देती है, तो संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया पूरी करने में कम से कम 90 दिन का समय लगेगा।

आयोग का प्रस्तावित शेड्यूल:

  • नगरीय निकाय चुनाव: दो चरणों में कराने के लिए 40 दिन
  • पंचायतीराज संस्थाएं (सरपंच-जिला परिषद): चार चरणों में कराने के लिए 50 दिन
  • अगर कोर्ट अनुमति देता है, तो यह चुनाव अब सितंबर से नवंबर 2026 के बीच ही संभव हो पाएंगे।

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