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विदेश से MBBS’ और भविष्य अधर में: राजस्थान के 1,000 डॉक्टर्स बिना रजिस्ट्रेशन घर बैठने को मजबूर; NMC और RMC के नियमों में उलझी ‘खाकी और स्टेथोस्कोप’ की साख

जयपुर। राजस्थान के चिकित्सा क्षेत्र में इन दिनों एक अजीब विडंबना देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां ग्रामीण और कस्बाई इलाकों के अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है, वहीं दूसरी तरफ विदेश से लाखों रुपये खर्च कर और देश का कड़ा स्क्रीनिंग टेस्ट पास कर लौटे 1,000 से अधिक फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMGs) आज बेरोजगार बैठे हैं। राजस्थान मेडिकल काउंसिल (RMC) द्वारा ‘परमानेंट रजिस्ट्रेशन’ न किए जाने के कारण ये डॉक्टर्स न तो किसी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में नौकरी कर पा रहे हैं और न ही खुद की क्लिनिक खोलकर प्रैक्टिस कर पा रहे हैं। यह संकट केवल प्रशासनिक देरी का नहीं है, बल्कि यह नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) के बार-बार बदलते नोटिफिकेशन और राज्य काउंसिलों के बीच संवादहीनता का नतीजा है, जिसने इन युवा प्रतिभाओं के करियर पर ‘लॉक’ लगा दिया है।

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विदेश से MBBS' और भविष्य अधर में: राजस्थान के 1,000 डॉक्टर्स बिना रजिस्ट्रेशन घर बैठने को मजबूर; NMC और RMC के नियमों में उलझी 'खाकी और स्टेथोस्कोप' की साख 2

विवाद की जड़: NMC के दो नोटिफिकेशन और ‘ऑनलाइन पढ़ाई’ का पेंच

इस पूरे संकट की शुरुआत इसी साल 18 मार्च 2026 को नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) द्वारा जारी किए गए एक नए नोटिफिकेशन से हुई। इस नोटिफिकेशन के जरिए NMC ने अपने ही पुराने (6 मार्च) के आदेश को वापस लेते हुए नई गाइडलाइन जारी कर दी।

असल में, कोविड-19 महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण सैकड़ों भारतीय छात्रों को बीच में ही विदेश छोड़कर भारत लौटना पड़ा था और उनकी पढ़ाई का कुछ हिस्सा ऑनलाइन मोड में पूरा हुआ था। NMC ने इस ऑनलाइन समय की भरपाई के लिए जो कड़े नियम बनाए, वही अब छात्रों के लिए जी का जंजाल बन गए हैं:

प्रवेश की अवधि (Cut-off Date)लागू होने वाला नियम (Regulation)इंटर्नशिप और क्लर्कशिप की शर्तें
18 नवंबर 2021 से पहलेस्क्रीनिंग टेस्ट रेगुलेशन 2002यदि विदेश में ही फिजिकल मोड में पूरी भरपाई और इंटर्नशिप पूरी कर ली है और वैलिड सर्टिफिकेट है, तो भारत में दोबारा अतिरिक्त इंटर्नशिप की जरूरत नहीं।
18 नवंबर 2021 या उसके बादCRMI रेगुलेशन 2021FMGE (फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जाम) पास करने के बाद भारत में 1 साल की अनिवार्य इंटर्नशिप (CRMI) करना आवश्यक है।
ऑनलाइन क्लास वाले छात्रकंपनसेटरी क्लर्कशिप नियम1 साल की क्लर्कशिप (अगर फाइनल ईयर में ऑनलाइन थे) या 2 साल की क्लर्कशिप (अगर पेनल्टीमेट/सेकंड लास्ट ईयर में ऑनलाइन थे)।

ग्राउंड जीरो की पीड़ा: परीक्षा और इंटर्नशिप पास, फिर भी ‘अवैध’

जयपुर और सवाई माधोपुर के कई केंद्रों पर अपनी शिकायत दर्ज कराने पहुंचे डॉक्टरों का दर्द अब सोशल मीडिया से लेकर सचिवालय की दीवारों तक गूंज रहा है। जयपुर के रहने वाले डॉ. अभिषेक गोयल की कहानी इस प्रशासनिक ढर्रे को बखूबी बयां करती है। उन्होंने सितंबर 2023 में अपनी एमबीबीएस पूरी की, जुलाई 2024 में देश का सबसे कठिन माना जाने वाला FMGE एग्जाम क्लियर किया और सवाई माधोपुर मेडिकल कॉलेज से अपनी इंटर्नशिप भी पूरी कर ली।

डॉ. अभिषेक बताते हैं:

“कोरोना के दौरान मैंने 6 महीने भारत में रहकर ऑनलाइन क्लास ली थी। लेकिन बाद में जब मैं अपनी विदेशी यूनिवर्सिटी वापस गया, तो मैंने उन 6 महीनों को ऑफलाइन क्लास में कन्वर्ट करवाकर ‘कंपनसेट’ (भरपाई) कर लिया। मेरे पास यूनिवर्सिटी का कंपनसेटरी सर्टिफिकेट और ट्रांसक्रिप्ट दोनों हैं। पासपोर्ट में एंट्री-एग्जिट की मुहरें गवाह हैं। इसके बावजूद RMC हमें परमानेंट रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं दे रही है। हमारे साथ अपराधियों जैसा सुलूक क्यों हो रहा है?”

यही हाल जॉर्जिया से पढ़कर लौटे डॉ. शुभम भारद्वाज का है, जो अपनी इंटर्नशिप पूरी करने के बाद पिछले कई महीनों से सिर्फ आरएमसी (RMC) के दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं।

काउंसिल का तर्क: “गाइडलाइन में स्पष्टता नहीं, पासपोर्ट खंगालने में लग रहा वक्त” (E-E-A-T Focus)

इस पूरे मामले पर जब ‘प्रशासनिक पक्ष’ टटोला गया, तो राजस्थान मेडिकल काउंसिल (RMC) के रजिस्ट्रार डॉ. गिरधर गोपाल गोयल ने माना कि भ्रम की स्थिति है। RMC के अनुसार, 6 मार्च और 18 मार्च को जो बैक-टू-बैक आदेश आए, उनमें ऑनलाइन स्टडी के कैलकुलेशन और 10 साल की ‘कोर्स कंप्लीशन टाइम लिमिट’ (एडमिशन की तारीख से 10 साल के भीतर कोर्स और इंटर्नशिप पूरा होना अनिवार्य) को लेकर कड़े नियम हैं।

नियमों की पेचीदगी:

  • पासपोर्ट वेरिफिकेशन अनिवार्य: अब स्टेट मेडिकल काउंसिल की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह छात्र के मूल पासपोर्ट को मंगाकर उसमें दर्ज ‘इमिग्रेशन स्टैम्प’ (एंट्री और एग्जिट रिकॉर्ड) का मिलान करे। यह देखा जा रहा है कि छात्र जितने दिन ऑनलाइन होने का दावा कर रहा है, क्या वह वाकई उस दौरान भारत में ही था? इस मैनुअल स्क्रूटनी में भारी समय लग रहा है।
  • सीटों का कोटा: नियमों के मुताबिक पुराने मेडिकल कॉलेजों में FMG छात्रों के लिए कुल स्वीकृत एमबीबीएस सीटों का केवल 7.5% हिस्सा ही क्लर्कशिप/इंटर्नशिप के लिए उपलब्ध है, जिससे राज्य के मेडिकल कॉलेजों पर भी दबाव बढ़ गया है। हालांकि राहत की बात यह है कि क्लर्कशिप के लिए कॉलेज अधिकतम ₹1,000 प्रति महीना ही फीस ले सकते हैं।

Smart SEO FAQ: जो लोग Google पर सर्च कर रहे हैं

1. राजस्थान मेडिकल काउंसिल FMG परमानेंट रजिस्ट्रेशन लेटेस्ट न्यूज़ क्या है?

NMC की 18 मार्च की नई गाइडलाइन के बाद ऑनलाइन क्लास और 10 साल की समय सीमा को लेकर भ्रम की स्थिति है। RMC ने स्पष्टता के लिए दिल्ली (NMC) को पत्र लिखा है, जिसके कारण लगभग 1,000 डॉक्टरों के परमानेंट रजिस्ट्रेशन अटके हुए हैं।

2. विदेश से एमबीबीएस करने के बाद भारत में प्रैक्टिस के क्या नियम हैं?

छात्र को सबसे पहले भारत सरकार का FMGE (स्क्रीनिंग टेस्ट) पास करना होता है। इसके बाद पासपोर्ट वेरिफिकेशन, स्टेट मेडिकल काउंसिल में अस्थाई पंजीकरण और फिर नियमों के अनुसार 1 या 2 साल की इंटर्नशिप/क्लर्कशिप पूरी करने के बाद ही स्थाई पंजीकरण मिलता है।

3. क्या कोविड के समय ऑनलाइन क्लास लेने वाले FMG डॉक्टर्स भारत में मान्य हैं?

हाँ, वे पूरी तरह मान्य हैं। बशर्ते उन्होंने अपनी विदेशी यूनिवर्सिटी में अतिरिक्त ऑफलाइन कक्षाएं ली हों या फिर भारत में आकर 1 से 2 साल की एडिशनल क्लर्कशिप पूरी की हो।

Senior Editorial Chief’s Viewpoint: देश के पैसे और प्रतिभा को लालफीताशाही की भेंट मत चढ़ाइए

संपादकीय विश्लेषण: भारत में एक तरफ डॉक्टरों की भारी कमी है, वहीं दूसरी तरफ योग्यता साबित कर चुके डॉक्टरों को फाइलों के फेर में उलझा कर रखा गया है। जब इन छात्रों ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBE) द्वारा आयोजित FMGE जैसी कठिन परीक्षा को पास कर लिया है, तो उनकी डिग्री की प्रामाणिकता पर बार-बार सवाल उठाना अनुचित है।

यदि नियमों में कोई ‘कन्फ्यूजन’ है, तो आरएमसी और एनएमसी के अधिकारियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक दिन में इस मसले को सुलझाना चाहिए, न कि छात्रों को महीनों तक दफ्तरों के चक्कर कटवाने चाहिए। डॉक्टरों के पासपोर्ट और एंबेसी वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को डिजिटल और तेज करने की जरूरत है। 30 सितंबर तक जहां सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में राजस्थानी भाषा जैसी नीतियों की रिपोर्ट मांगी है, वहीं सरकार को इन डॉक्टरों के भविष्य को लेकर भी संवेदनशील रुख अपनाना होगा, वरना हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था और इन युवाओं का भविष्य, दोनों ही वेंटिलेटर पर चले जाएंगे।

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