• Fri. Jun 12th, 2026

भरतपुर CMHO की मॉनिटरिंग पर ‘डिजिटल’ ग्रहण: 8 पीएचसी में 3000 मरीज आए, पर दवा वितरण रिकॉर्ड ‘शून्य’; आखिर कहाँ जा रही है सरकारी दवाई?

भरतपुर (राजस्थान)। राजस्थान सरकार एक ओर ‘निःशुल्क दवा योजना’ और ‘ई-औषधि पोर्टल’ के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता का दावा करती है, वहीं मुख्यमंत्री के गृह संभाग भरतपुर में जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। जिले के सीएमएचओ (CMHO) कार्यालय की सुस्त मॉनिटरिंग के कारण सरकार की क्रमोन्नत की गई 8 नई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) सफेद हाथी साबित हो रही हैं। आलम यह है कि मार्च 2026 के एक ही महीने में इन केंद्रों पर 3,132 मरीज इलाज के लिए पहुँचे, लेकिन ऑनलाइन रिकॉर्ड में एक भी दवा वितरण की एंट्री दर्ज नहीं की गई。

image 17
भरतपुर CMHO की मॉनिटरिंग पर 'डिजिटल' ग्रहण: 8 पीएचसी में 3000 मरीज आए, पर दवा वितरण रिकॉर्ड 'शून्य'; आखिर कहाँ जा रही है सरकारी दवाई? 3

कागजों में पीएचसी, हकीकत में ‘ऑफलाइन’ अंधेरगर्दी

राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए उप-स्वास्थ्य केंद्रों को पीएचसी (PHC) में क्रमोन्नत किया था। नियम के अनुसार, हर मरीज को दी जाने वाली दवा की प्रविष्टि ई-औषधि पोर्टल पर अनिवार्य है ताकि स्टॉक और वितरण में पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन भरतपुर की इन 8 नई पीएचसी पर सारा काम ‘ऑफलाइन’ और मनमर्जी से चल रहा है।

पीएचसी-वार ओपीडी और रिकॉर्ड की स्थिति (मार्च 2026):

पीएचसी का नामओपीडी (मरीजों की संख्या)ई-औषधि पर ऑनलाइन एंट्री
अटारी7350 (शून्य)
बरोलीरान4790 (शून्य)
इकरन4110 (शून्य)
हथैनी (सेवर)3800 (शून्य)
बसई (रूपवास)3500 (शून्य)
बीलौठ (नदबई)3150 (शून्य)
सुनारी2600 (शून्य)
फुलवारा2020 (शून्य)
कुल योग3,13200

बड़ा सवाल: भ्रष्टाचार या लापरवाही? (Investigative Analysis)

स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का मानना है कि ऑनलाइन एंट्री न होना केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ी अनियमितता की ओर इशारा करती है।

  1. स्टॉक का घालमेल: जब दवा वितरण का रिकॉर्ड ऑनलाइन नहीं होगा, तो यह पता लगाना नामुमकिन है कि सरकारी स्टॉक से कितनी दवाइयां वास्तव में मरीजों को मिलीं और कितनी ‘लीकेज’ का शिकार हुईं।
  2. मांग और आपूर्ति का संकट: ई-औषधि पोर्टल पर शून्य रिकॉर्ड होने का मतलब है कि पोर्टल की नज़र में इन पीएचसी पर दवाइयों की खपत ही नहीं हुई। ऐसे में भविष्य में इन केंद्रों पर दवाओं की सप्लाई बाधित हो सकती है।
  3. पारदर्शिता की धज्जियां: सरकार ने डिजिटल सिस्टम इसलिए बनाया था ताकि दवाइयों की कालाबाजारी रुके, लेकिन सीएमएचओ कार्यालय की मॉनिटरिंग फेल होने से यह उद्देश्य ही खत्म हो गया है।
image 18
भरतपुर CMHO की मॉनिटरिंग पर 'डिजिटल' ग्रहण: 8 पीएचसी में 3000 मरीज आए, पर दवा वितरण रिकॉर्ड 'शून्य'; आखिर कहाँ जा रही है सरकारी दवाई? 4

हाइपर-लोकल इम्पैक्ट: भरतपुर के ग्रामीण क्षेत्रों पर असर

भरतपुर जिले के सेवर, नदबई, और रूपवास जैसे ब्लॉक के ग्रामीण मरीज पूरी तरह इन पीएचसी पर निर्भर हैं। जब रिकॉर्ड ही दुरुस्त नहीं है, तो मरीजों को मिलने वाली दवाओं की गुणवत्ता और उपलब्धता पर संदेह होना लाजमी है। यह स्थिति मुख्यमंत्री के ‘निरोगी राजस्थान’ अभियान को सीधे तौर पर ठेंगा दिखा रही है।

अधिकारियों का पक्ष: जांच का पुराना राग

मामला गरमाने के बाद भरतपुर सीएमएचओ डॉ. गौरव कपूर ने कहा है कि इस लापरवाही की जांच कराई जाएगी और दोषी कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि जब एक महीने तक हजारों मरीजों की ओपीडी हो रही थी, तब जिले के आला अधिकारी कुंभकर्णी नींद क्यों सो रहे थे?

Smart FAQ Section: ई-औषधि पोर्टल और आपके अधिकार

1. ई-औषधि पोर्टल क्या है और यह क्यों जरूरी है?

यह राजस्थान सरकार का एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जहाँ हर सरकारी अस्पताल में उपलब्ध दवाओं के स्टॉक और उनके वितरण का लाइव डेटा रखा जाता है। इससे दवाओं की चोरी और कालाबाजारी रुकती है।

2. अगर सरकारी अस्पताल में दवा की पर्ची ऑनलाइन नहीं काटी जा रही तो क्या करें?

मरीज या उनके परिजन इसकी शिकायत टोल-फ्री नंबर 181 (राजस्थान संपर्क) या सीधे जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) से कर सकते हैं।

3. क्या बिना ऑनलाइन एंट्री के दवा लेना सुरक्षित है?

सुरक्षा से ज्यादा यह पारदर्शिता का मामला है। बिना ऑनलाइन रिकॉर्ड के यह सुनिश्चित करना कठिन है कि दवा एक्सपायरी तो नहीं है या स्टॉक रजिस्टर में उसका मिलान सही है या नहीं।

Editor’s Note: जवाबदेही तय होना अनिवार्य

निष्कर्ष: 8 पीएचसी में एक साथ रिकॉर्ड शून्य होना कोई मानवीय भूल नहीं, बल्कि सिस्टम की गहरी विफलता है। केवल छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर सीएमएचओ कार्यालय अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अगर राज्य सरकार डिजिटल इंडिया और पारदर्शी शासन की बात करती है, तो ऐसे गंभीर मामलों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी होगी ताकि सरकारी खजाने से खरीदी गई दवाइयां वास्तव में गरीब मरीजों की नसों तक पहुँचे, न कि निजी मेडिकल स्टोरों की अलमारियों में।

You missed