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जोधपुर फैमिली कोर्ट का बड़ा फैसला: बाल विवाह रद्द होने पर भी ‘पूर्व पति’ को देना होगा गुजारा भत्ता; 95 बीघा जमीन और पत्थर की खान वाले ‘नीट’ छात्र की बेरोजगारी वाली दलील खारिज

जोधपुर (राजस्थान)। राजस्थान की न्यायधानी जोधपुर से एक ऐसा कानूनी फैसला सामने आया है, जो प्रदेश में सामाजिक कुरीतियों के बीच फंसी महिलाओं के अधिकारों को नई दिशा देगा। जोधपुर पारिवारिक न्यायालय संख्या-1 ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी महिला का बाल विवाह अदालत द्वारा शून्य (रद्द) भी कर दिया जाता है, तो भी वह अपने पति से भरण-पोषण (Alimony) पाने की हकदार है。 कोर्ट का यह निर्णय उन पुरुषों के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं。

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जोधपुर फैमिली कोर्ट का बड़ा फैसला: बाल विवाह रद्द होने पर भी 'पूर्व पति' को देना होगा गुजारा भत्ता; 95 बीघा जमीन और पत्थर की खान वाले 'नीट' छात्र की बेरोजगारी वाली दलील खारिज 2

ऐतिहासिक फैसला: नीट छात्र की 7 साल पुरानी ‘बेरोजगारी’ का खुला राज

जोधपुर के पीठासीन अधिकारी सतीश चन्द्र गोदारा की अदालत ने बालेसर निवासी मदन गोपाल को आदेश दिया है कि वह अपनी पत्नी गुड्डी को 6 जुलाई 2021 से प्रतिमाह 8,000 रुपये का भुगतान करे。 पति ने अदालत में दलील दी थी कि वह पिछले 7 वर्षों से कोटा में रहकर नीट (NEET) की तैयारी कर रहा है और उसके पास आय का कोई साधन नहीं है。 हालांकि, कोर्ट ने जब उसके बैंक खातों की जांच की, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पति के खाते में मात्र 65 दिनों के भीतर लगभग 88,000 रुपये का लेनदेन पाया गया, जिससे उसकी ‘बेरोजगारी’ की पोल खुल गई。

आटा-साटा प्रथा और दहेज का दंश (Background & Data Expansion)

प्रार्थिया गुड्डी का विवाह 4 मई 2018 को मदन गोपाल के साथ राजस्थान की प्रचलित ‘आटा-साटा’ प्रथा के तहत हुआ था。

  • आटा-साटा क्या है?: यह एक ऐसी प्रथा है जिसमें एक परिवार की बेटी दूसरे परिवार में ब्याही जाती है और बदले में उस परिवार की बेटी पहले परिवार के लड़के से ब्याही जाती है। इस प्रथा के कारण अक्सर नाबालिग बच्चों का विवाह कर दिया जाता है。
  • कानूनी संघर्ष: गुड्डी ने आरोप लगाया कि ससुराल में उसे अनपढ़ कहकर ताने दिए गए, खेती का भारी काम कराया गया और दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया。 यहां तक कि गर्भवती होने पर उसे जबरन दवा खिलाकर उसका गर्भपात कराने जैसे संगीन आरोप भी सामने आए हैं。
  • शून्य विवाह का पेच: हालांकि 26 नवंबर 2025 को इस बाल विवाह को शून्य घोषित कर दिया गया था, लेकिन कोर्ट ने माना कि भरण-पोषण की जिम्मेदारी शादी के वैध या अवैध होने से परे है。

सुप्रीम कोर्ट की नजीर: ‘शून्य विवाह’ पर क्या है कानून? (Expert View)

पति का मुख्य तर्क था कि जब शादी ही कानूनी रूप से ‘शून्य’ (Void) है, तो वह खर्चा क्यों दे? इस पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सुखदेव सिंह बनाम सुखवीर कौर’ मामले की नजीर पेश की。

कानूनी स्थिति: यदि दो लोग पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं, तो विवाह रद्द होने के बाद भी महिला की गरिमा और उसके जीवनयापन के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता。

पक्षकारों की वित्तीय स्थिति का विश्लेषण (Financial Breakdown)

पक्षसंपत्ति/आय का दावाकोर्ट का निष्कर्ष
पत्नी (गुड्डी)ससुराल में 95 बीघा जमीन और पत्थर की खानसिलाई करके गुजारा करना पर्याप्त नहीं
पति (मदन)7 साल से नीट की तैयारी, आय शून्यबैंक खाते में लाखों का लेनदेन, आर्थिक स्थिति सुदृढ़
परिवार की आयवार्षिक 20 लाख रुपये से अधिकपति भरण-पोषण देने में पूरी तरह सक्षम

हाइपर-लोकल इम्पैक्ट: बालेसर और जोधपुर का ग्रामीण परिवेश

जोधपुर के बालेसर जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में पत्थर की खानें (Stone Mines) और उपजाऊ कृषि भूमि आर्थिक समृद्धि का मुख्य स्रोत हैं। पति की यह दलील कि वह केवल एक विद्यार्थी है और उसके पिता उसका खर्च उठाते हैं, कोर्ट को इसलिए भी नहीं जंची क्योंकि उसके बैंक स्टेटमेंट एक संपन्न जीवनशैली की ओर इशारा कर रहे थे。

Smart FAQ Section: बाल विवाह और भरण-पोषण पर महत्वपूर्ण सवाल

1. क्या बाल विवाह रद्द होने के बाद भी पत्नी केस कर सकती है?

हां, सुप्रीम कोर्ट और फैमिली कोर्ट के आदेशानुसार, यदि आप पति-पत्नी के रूप में साथ रहे हैं, तो विवाह रद्द होने पर भी आप भरण-पोषण की मांग कर सकती हैं。

2. अगर पति बेरोजगार होने का नाटक करे तो क्या होगा?

अदालत केवल मौखिक बयानों पर भरोसा नहीं करती। बैंक स्टेटमेंट, सोशल मीडिया एक्टिविटी और परिवार की चल-अचल संपत्ति (जैसे इस मामले में 95 बीघा जमीन) को आधार बनाकर कोर्ट पति की ‘कमाने की क्षमता’ (Capacity to Earn) का आकलन करती है。

3. भरण-पोषण की राशि कब से लागू होती है?

आमतौर पर, यह राशि उस तिथि से लागू होती है जब पत्नी ने गुजारे भत्ते के लिए कोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश किया था (इस केस में 6 जुलाई 2021 से)。

Editor’s Note: सामाजिक न्याय की जीत

निष्कर्ष: यह फैसला उन हजारों लड़कियों के लिए उम्मीद की किरण है जो बाल विवाह या जबरन शादियों का शिकार होती हैं。 नीट की तैयारी का बहाना बनाकर या बेरोजगार बनकर कोई भी व्यक्ति अपने संवैधानिक दायित्वों से नहीं बच सकता。 प्रशासन को चाहिए कि ‘आटा-साटा’ और बाल विवाह जैसी प्रथाओं के खिलाफ न केवल कानूनी कार्रवाई करें, बल्कि ग्रामीण इलाकों में कानूनी जागरूकता भी बढ़ाएं।

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