जयपुर (राजस्थान)। राजस्थान के चिकित्सा और शिक्षा जगत को शर्मसार करने वाला एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। राजस्थान फार्मेसी काउंसिल (RMC) ने नियमों और नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हुए 133 से अधिक ऐसे अभ्यर्थियों का पंजीकरण (Registration) कर दिया, जिनकी डिग्रियों को संबंधित यूनिवर्सिटी ने पहचानने से ही इनकार कर दिया है。 यह घोटाला केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यूनिवर्सिटी की फर्जी डिजिटल आईडी बनाकर दस्तावेजों का ‘ऑनलाइन वेरिफिकेशन’ तक कर दिया गया。 इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए सरकार ने काउंसिल के रजिस्ट्रार नरेन्द्र रैगर को पद से हटा दिया है और उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गई है。

फर्जीवाड़े का डिजिटल खेल: यूनिवर्सिटी की ‘फेक आईडी’ से हुआ वेरिफिकेशन
आमतौर पर किसी भी फार्मेसी डिग्री के पंजीकरण से पहले काउंसिल संबंधित यूनिवर्सिटी से दस्तावेजों का सत्यापन (Verification) कराती है。 इस घोटाले में शातिर तरीका अपनाया गया:
- फेक लॉगिन क्रेडेंशियल: काउंसिल के कुछ पदाधिकारियों ने यूनिवर्सिटी के नाम पर फर्जी आईडी और पासवर्ड तैयार किए。
- खुद ही किया सत्यापन: अभ्यर्थियों ने ओपीजेएस यूनिवर्सिटी (OPJS University), सादुलपुर (चूरू) के नाम से डिग्रियां पेश कीं और काउंसिल स्तर पर उन्हीं फर्जी आईडी का उपयोग कर दस्तावेजों को ‘सत्यापित’ दिखा दिया गया。
- 7 महीने में 130+ रजिस्ट्रेशन: मात्र 7 महीनों के भीतर नियमों के विपरीत जाकर 130 से अधिक संदिग्ध आवेदनों को हरी झंडी दे दी गई。
ओपीजेएस यूनिवर्सिटी का दावा: “न एडमिशन हुए, न परीक्षा” (Background Info)
चूरू की ओपीजेएस यूनिवर्सिटी ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि जिन वर्षों की डिग्रियां दिखाई गई हैं, उस दौरान यूनिवर्सिटी में फार्मेसी के ऐसे कोई एडमिशन या परीक्षा आयोजित ही नहीं हुई थी。
- सरकार की रोक: जून 2024 में राज्य सरकार ने यूनिवर्सिटी के नए एडमिशन पर रोक लगा दी थी。
- जांच कमेटी: शिक्षा विभाग (ग्रुप-4) ने मुख्यमंत्री और राज्यपाल को पत्र लिखकर इन डिग्रियों के संदिग्ध होने की जानकारी दी थी, जिसके बाद धारा 44 के तहत जांच कमेटी गठित की गई है。
प्रशासनिक हंटर: रजिस्ट्रार की शक्तियां सीज, पुलिस केस दर्ज
घोटाले की परतें खुलने के बाद सरकार और काउंसिल के अध्यक्ष महावीर सौगानी ने सख्त कदम उठाए हैं:
- FIR दर्ज: चूरू के हमीरवास थाने में रजिस्ट्रार नरेन्द्र रैगर और चार अन्य कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है。
- पद से बर्खास्तगी: रैगर को पद से हटाकर उनकी सभी प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां सीज कर दी गई हैं。
- फाइनेंशियल ऑडिट की मांग: यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने पुलिस से मांग की है कि रजिस्ट्रार, काउंसिल मेंबर्स और अभ्यर्थियों के बीच हुए वित्तीय लेन-देन का ‘फोरेंसिक ऑडिट’ कराया जाए。
हाइपर-लोकल इम्पैक्ट: जयपुर और चूरू के शिक्षा हब पर असर
जयपुर स्थित फार्मेसी काउंसिल का यह भ्रष्टाचार पूरे राजस्थान के मेडिकल स्टोर्स और फार्मा क्षेत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है। यदि फर्जी डिग्री वाले लोग फार्मासिस्ट के रूप में पंजीकृत होकर दवाइयां बेचेंगे, तो यह आम जनता की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है। चूरू जिले के हमीरवास क्षेत्र में दर्ज हुई FIR इस बात का संकेत है कि इस गिरोह के तार ग्रामीण इलाकों तक फैले हुए हैं।
मामले का संक्षिप्त विश्लेषण (Quick Look Table)
| विवरण | जानकारी |
| कुल फर्जी पंजीकरण | 133 से अधिक |
| संबंधित यूनिवर्सिटी | ओपीजेएस यूनिवर्सिटी, सादुलपुर (चूरू) |
| मुख्य आरोपी | नरेन्द्र रैगर (तत्कालीन रजिस्ट्रार) |
| धोखाधड़ी का तरीका | फर्जी यूनिवर्सिटी आईडी से फर्जी वेरिफिकेशन |
| वर्तमान स्थिति | रजिस्ट्रार पदमुक्त, हमीरवास थाने में FIR दर्ज |
Smart FAQ Section: फर्जी डिग्री और रजिस्ट्रेशन से जुड़े सवाल
1. क्या फर्जी डिग्री के आधार पर मिला रजिस्ट्रेशन रद्द होगा?
हाँ, जांच पूरी होने के बाद काउंसिल ऐसे सभी फर्जी पंजीकरणों को स्थायी रूप से निरस्त कर देगी और संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी。
2. आम आदमी कैसे चेक करे कि फार्मासिस्ट असली है या नकली?
मरीज फार्मेसी काउंसिल की वेबसाइट पर जाकर फार्मासिस्ट के रजिस्ट्रेशन नंबर के जरिए उसकी वैधता चेक कर सकते हैं।
3. इस घोटाले का मेडिकल स्टोर्स पर क्या असर पड़ेगा?
यदि किसी स्टोर पर इन फर्जी फार्मासिस्टों के नाम से लाइसेंस लिया गया है, तो उन दुकानों के लाइसेंस भी रद्द किए जा सकते हैं।
Editor’s Note: शिक्षा माफिया और सिस्टम की साठगांठ
निष्कर्ष: फार्मेसी काउंसिल का यह कांड केवल एक ‘क्लर्क’ या ‘रजिस्ट्रार’ की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम में बैठे भ्रष्ट तंत्र की गहरी साठगांठ है। जब यूनिवर्सिटी खुद कह रही है कि एडमिशन नहीं हुए, तो काउंसिल के अधिकारियों ने आँखें मूंदकर रजिस्ट्रेशन कैसे कर दिए? यह ‘लो वैल्यू कंटेंट’ नहीं, बल्कि ‘हाई वैल्यू करप्शन’ है। सरकार को चाहिए कि इस मामले में न केवल विभागीय कार्रवाई करे, बल्कि उन अभ्यर्थियों को भी सलाखों के पीछे भेजे जिन्होंने फर्जी डिग्री के दम पर लोगों की सेहत से सौदा करने की कोशिश की।