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JLN अस्पताल लापरवाही मामला: कोर्ट ने खारिज की पुलिस की FR, रेजिडेंट डॉक्टर और ASI के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी

अजमेर। अजमेर की एक अदालत ने करीब चार साल पुराने चिकित्सा लापरवाही के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम वर्ग) की अदालत ने जेएलएन अस्पताल के एक मरीज की मौत के मामले में पुलिस द्वारा पेश की गई अंतिम रिपोर्ट (FR) को ‘दूषित’ करार देते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने इस मामले में रेजिडेंट डॉक्टर खुशबू जैन और कोतवाली थाने के तत्कालीन ASI देवाराम गोदारा के खिलाफ प्रसंज्ञान लेते हुए दोनों के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी करने के आदेश दिए हैं।

क्या था पूरा मामला?

मामला सितंबर 2020 का है, जब सरिता भटनागर ने अपने 55 वर्षीय पति प्रभास भटनागर को निमोनिया की शिकायत के बाद जेएलएन अस्पताल में भर्ती कराया था। करीब एक महीने तक चले इलाज के बाद 27 अक्टूबर 2020 को प्रभास की मौत हो गई। सरिता ने आरोप लगाया कि उनके पति की मौत स्वाभाविक नहीं थी, बल्कि यह डॉक्टर खुशबू जैन और अस्पताल स्टाफ की घोर लापरवाही और उपेक्षापूर्ण व्यवहार का परिणाम थी।

लापरवाही के संगीन आरोप

अदालत में पेश किए गए गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए:

  • ऑक्सीजन सपोर्ट में लापरवाही: आरोप है कि मरीज गंभीर हालत में ऑक्सीजन सपोर्ट पर था, लेकिन ड्यूटी स्टाफ ने खाली सिलेंडर बदलने और मास्क की देखभाल करने में ढिलाई बरती।
  • इलाज से इनकार: गवाहों ने दावा किया कि जब मरीज की स्थिति बिगड़ी, तो स्टाफ ने उसे देखने से मना कर दिया और परिजनों के साथ बदसलूकी व धक्का-मुक्की की गई।
  • साक्ष्यों से छेड़छाड़: यह भी आरोप लगा कि पुलिस ने जांच के दौरान जानबूझकर सीसीटीवी (CCTV) फुटेज जब्त नहीं किए, ताकि दोषियों को बचाया जा सके।

पुलिस की जांच पर कोर्ट की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया (अनुसंधान) को पूरी तरह पक्षपातपूर्ण माना। मजिस्ट्रेट ने टिप्पणी की कि तत्कालीन एएसआई देवाराम गोदारा ने मामले की निष्पक्ष जांच करने के बजाय परिवादिया को ‘विधिक क्षति’ पहुँचाई और असली तथ्यों को छिपाया। इसी आधार पर कोर्ट ने पुलिस की एफआर को रद्द कर दिया। साथ ही, एएसआई देवाराम के खिलाफ लापरवाही बरतने के आरोप में विभागीय जांच शुरू करने के भी आदेश दिए हैं।

अगली सुनवाई 4 जून को

वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल नाग के जरिए दायर की गई प्रोटेस्ट पिटीशन को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने अब दोषियों को कानून के शिकंजे में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 जून 2026 को होगी। इस फैसले के बाद चिकित्सा जगत और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।

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