राजस्थान के राज्य पशु ऊंटों की संख्या में आ रही लगातार गिरावट को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए सरकार से जवाब तलब किया है कि ऊंट संरक्षण अधिनियम लागू होने के बावजूद इनकी आबादी क्यों आधी रह गई है।
वर्ष 2014 में ऊंट को राज्य पशु का दर्जा दिया गया था और उनके अवैध व्यापार व वध को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए गए थे। हालांकि, धरातल पर इन कानूनों का असर नगण्य रहा है, जिससे ऊंटों की संख्या में भारी कमी देखी जा रही है। पशुपालन विभाग के आंकड़े इस चिंताजनक स्थिति की पुष्टि करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंट पालकों को मिल रही आर्थिक चुनौतियों और चरागाहों की कमी के कारण लोग ऊंट पालन से विमुख हो रहे हैं। हाईकोर्ट ने अब संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे इन मूक प्राणियों के संरक्षण के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करें और भविष्य में इनकी संख्या बढ़ाने के उपाय सुनिश्चित करें।
कोर्ट की इस सख्ती के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि प्रशासन ऊंटों के संरक्षण और उनके पालकों की समस्याओं के समाधान के लिए कोई सकारात्मक कदम उठाएगा। ऊंट न केवल राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, बल्कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।